
Chhapra/छपरा के उमानाथ मंदिर स्थित दधिचि आश्रम को टूरिस्ट स्पॉट बनने का इंतजार है. पौराणिक कथाओं में वर्णित इस तपोभूमि को दान की भूमि के रूप में भी जाना जाता है. असुरों के आक्रमण से त्रस्त होकर देवराज इंद्र ने अस्त्रों के निर्माण के लिये महर्षि दधिचि की अस्थियां दान स्वरूप मांगी थी. दधीचि ने धर्म और मानवता की रक्षा के लिये सहर्ष अपनी अस्थियां दान में दे दी थीं. उन अस्थियों से दो धनुष बने थे. एक सारंग और दूसरा पिनाका. इन्ही में से एक धनुष की प्रत्यंचा भगवान राम ने चढ़ायी थी जिस क्रम में वह टूट गया था. वहीं शेष बची अस्थियों से वज्र का निर्माण हुआ जिससे वृतासुर का वध हुआ. महर्षि दधीचि की मूर्ति आज भी इस तपोभूमि में मौजूद है. शिवपुराण में इस कि चर्चा मिलती है. वर्तमान में इस मंदिर में प्राचीन शिवलिंग व दधीचि मंदिर है जहां स्थानीय लोग पूजा अर्चना के लिये आते हैं. बीते 10 वर्षों में स्थानीय लोगों और मंदिर निर्माण समिति के प्रयास से इसके जीर्णोद्धार का कार्य हुआ है. हालांकि जनप्रतिनिधियों ने आज तक इस मंदिर का चाव नही किया.



