Tuesday, April 21, 2026
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बिहार के गौरवशाली इतिहास का ध्वजवाहक है सारण

शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, अध्यात्म, राजनीति आदि क्षेत्रों में सारण की अपनी विशिष्ट पहचान

गौतम ऋषि आश्रम, गोदना, रिविलगंज
दधिचि आश्रम, दहियांवा, छपरा
छपरा.बिहार की चर्चा सारण के बगैर अधूरी है. सारण हमेशा ही बिहार के गौरवशाली इतिहास का ध्वजवाहक रहा है. शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, आध्यात्म और राजनीति आदि विविध क्षेत्रों में सारण ने अपनी विशिष्ट पहचान बनायी है. सारण ने अपने उद्भव से लेकर विभिन्न कालखंडों में सभ्यता के विकास और सांस्कृतिक सम्पूर्णताओं का जीवंत रूप देखा है. गंगा, घाघरा और गंडक नदी की कलकल ध्वनि तथा यहां के ऋषि मुनियों का तप सारण की ऐतिहासिकता को मूर्त रूप देती है. 1981 में प्रमंडल का दर्जा मिलने के बाद सारण ने विकास के नये आयाम देख हैं. लेकिन इतिहास के पन्नो में सारण का नाम हमेशा ही सभ्यता, संस्कृति, साहित्य व जनक्रांति के ध्वजवाहक के रूप में लिया जायेगा.
समृद्धशाली है सारण की पौराणिकता
सारण पौराणिक दृष्टिकोण से दान और तप की भूमि है.
छपरा शहर में सरयू नदी के किनारे स्थित उमानाथ मंदिर का जिक्र पौराणिक कथाओं में मिलता है. इंद्र ने जिस वज्र से असुरों के विरुद्ध जीत दर्ज की थी वो इसी आश्रम के महान तपस्वी दधीचि के हड्डियों से बना था. आश्रम में आज भी दधीचि की मूर्ति मौजूद है और उनके तपस्या की कहानी यहां आकर बखूबी समझी जा सकती है. सोनपुर का हरिहरनाथ मंदिर विश्वप्रसिद्ध तो है ही साथ ही यह एक ऐसा मंदिर है जहां ब्रम्हा द्वारा स्थापित शिव एवं विष्णु की एकीकृत मूर्ति पूरे दुनिया में एक मात्र है. संगम किनारे स्थित इस मंदिर की मूर्तियों में शुंगकालीन स्तंभ पाया गया है. वहीं पाल एवं गुप्त काल की भी कुछ मूर्तियां मौजूद हैं. रिविलगंज स्थित गौतम ऋषि आश्रम में अहिल्या उद्धार की कथा यहां के लोगों को आज भी इस धरती पर गर्व करने का अवसर देती है.
दानी मौर्यध्वज मंदिर, चिरांद, डोरीगंज
सभ्यता के विकास का मजबूत आधार है चिरांद
प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को विश्व पटल पर प्रदर्शित कर रहा चिरांद सारणवासियों के गर्व का केंद्र है. यहां से मिले नवपाषाणकालीन अवशेष उस समय की सभ्यता को समेटे हुए हैं. संगम तट पर स्थित चिरांद में पाये गये मृदभांड, अवशेष तथा यहां के घाटों की बनावट अब भी लोगों को अपनी और आकर्षित करता है. वहीं डोरीगंज के पास दानी मौर्यध्वज के किले का अवशेष भी लोगों को अपनी और आकर्षित करता है. आज सारण की चर्चा सभ्यता और संस्कृति के इस उद्गम स्थल के बगैर अधूरी है.
सारण ने जगाई राष्ट्र की चेतना
देश की आजादी हो या समाज के लिए किये गये ऐतिहासिक आंदोलन सारण के लोगों ने अपने साहस और कर्तव्यनिष्ठा से इस भूमि को महान बनाया है. जनचेतना को जागृत कर राष्ट्र को प्रगति की राह दिखाने में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की अग्रणी भूमिका रही है. आज सिताबदियारा में बना राष्ट्रीय संग्रहालय पूरे देश को सम्पूर्ण क्रांति के अनछुए पहलुओं से रूबरू करा रहा है. अपने बौद्धिक क्षमता से देश को एक सशक्त संविधान देने वाले प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद तथा मौलाना मजहरूल हक कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने सारण को देश में ही नही बल्कि विश्व में ख्याति दिलायी है.
साहित्य व संस्कृति का धनी है सारण
देश मे सारण की विशेष पहचान बनाने में राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ यहां के साहित्यिक व सांस्कृतिक विचारों का भी योगदान रहा है. राहुल सांकृत्यायन का अविरल सहित्य, लोककवि भिखारी ठाकुर की ज्वलंत रचनायें, पंडित महेंद्र मिश्र की पूर्वी इतिहास के पन्नो में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है. विश्व के कई शैक्षणिक संस्थाओं में सारण का साहित्य व संस्कृति पाठ्यक्रमों में शामिल है. बात जब बिहार के गौरव की होती है तब सारण ने कई अहम मौकों पर अपने सांस्कृतिक इतिहास के जरिये राज्य का मान बढ़ाया है. इसके अतिरिक्त ऐसे सैकड़ों उद्दाहरण हैं जो सारण को बिहार ही नही पूरे देश में अलग पहचान दिलाता है.
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